Tuesday, 16 August 2011

बस एक बार... तुम चलो साथ



क्या यही देश, क्या यही भेष है
क्या इस पर झुकते.. शीश अनेक है
जहां तुम भी विवश और हम भी विवश हैं
जहां हर पल बिकते... लोग ये रोज हैं
भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है,नेताओं का खेल यहां है.
हर शख्स यहां...हैरां ही हेरां...
सब जानते हैं... पर चुप यहां हैं..
ऐसा तो मेरा देश ना था..।
 कहते है...आज़ाद है भारत..
 पर आज भ्रष्टाचार का गुलाम है भारत..
हुआ भ्रष्टाचार का... अडडा भारत
इसी से मुक्त.. कराने आया
प्रजातंत्र को... जगाने आया
क्रान्ति की एक.. अलख जगाने
गांधी जैसा.. अन्ना आया
अब है फैसला,कुछ तो है करना
भ्रष्टाचार का... सर है कुचलना
भ्रष्टाचारियों पर.. नकेल है कसनी
तब पवित्र... होगी ये जननी
इसके लिए.. तुम दो साथ..तुम चलो साथ
बस एक बार...बस एक बार
अन्ना और इस देश की ख़ातिर
तुम..चलो साथ..तुम...चलो साथ......
तुम..चलो साथ..तुम...चलो साथ......

Saturday, 21 May 2011

मेरे गांव की...डिग्गी

जब तक मैं आपको डिग्गी की कहानी बताऊं,उससे पहले आपको इस शब्द का मतलब समझा देता हूं..डिग्गी,हमारे गांव में पानी इकठ्ठा करने की...हमारे गांव में ही क्या..पहाड़ी इलाकों में सीमेंट और पत्थरों से बनाई गई टंकी की तरह एक आयताकार संरचना होती है,जिसमें पानी इकठ्ठा कर सभी गांव वाले इसे उपयोग में लाते हैं...जब कभी नलों में पानी नहीं आता..और इसमें पानी बहुत दूर..जंगलों से..गधेरों से(नाले के समान)..जहां भी पानी मिलता है,पाइप की सहायता से..लोहे के नलों की सहायता से... बड़े ही जतन के साथ जोड़-तोड़ कर इस डिग्गी में इकठ्ठा किया जाता है,ताकि जिसे भी पानी की ज़रुरत महसूस हो वो बिना किसी हिचक के इसका पानी उपयोग में ला सकता था..ये तो हुई डिग्गी की बात...अब समस्या ये है कि आज के ज़माने में इसकी किसी को परवाह नहीं है.ये या तो टूट-फूट गई हैं,या किसी उपयोग में नहीं लाई जातीं..जोकि पानी के उपयोग के लिए पहाड़ों में सबसे अच्छा माध्यम माना जाता था..अब मैं जब घर जाता हूं तो इनकी दुर्दशा देखकर पुराने दिनों की याद आती है..जब इन्हीं डिग्गियों से हम लोग स्कूल के कपड़ों को धोकर इसपर ही सुखाने के लिए फैला दिया करते थे..प्यासे जानवरों के लिए बाल्टी भरकर पानी ले जाया करते थे..छोटे छोटे बच्चे(मैं भी जब घर में रहता था)नहाते समय एक दूसरे पर पानी उछाल उछालकर मस्ती किया करते थे..इन्ही डिग्गियों के आसपास लुका-छिपी का खेल खेला करते थे..आज सोचता हूं क्या ये वही डिग्गियां हैं..जो घासफूस,घनी झाड़ियों से ढकी और टूटी फूटी आसमां की ओर निहारती रहती हैं..बड़ी मुश्किल से उसका मुहाना दिख पाता है..बस मेरी लोगों से एक छोटी सी दरख्वास्त है कि पुरानी चीजों को हमेशा सहेज कर रखें..उनको नष्ट ना होने दें......काश ये डिग्गियां पहले की तरह हो जाएं..इनको ठीक करने का जितना भी प्रयास संभव हो सके करें, ताकि ये डिग्गियां भी कहीं यादों में ही बसकर ना रह जाएं..कुछ ऐसा हो कि जब मैं उस डिग्गी के पास से गुजरूं तो छोटे-छोटे बच्चों को एक बार फिर पानी से मस्ती करते हुए देख सकूं.........