
क्या यही देश, क्या यही भेष है
क्या इस पर झुकते.. शीश अनेक है
जहां तुम भी विवश और हम भी विवश हैं
जहां हर पल बिकते... लोग ये रोज हैं
भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है,नेताओं का खेल यहां है.
हर शख्स यहां...हैरां ही हेरां...
सब जानते हैं... पर चुप यहां हैं..
ऐसा तो मेरा देश ना था..।
कहते है...आज़ाद है भारत..
पर आज भ्रष्टाचार का गुलाम है भारत..
हुआ भ्रष्टाचार का... अडडा भारत
इसी से मुक्त.. कराने आया
प्रजातंत्र को... जगाने आया
क्रान्ति की एक.. अलख जगाने
गांधी जैसा.. अन्ना आया
अब है फैसला,कुछ तो है करना
भ्रष्टाचार का... सर है कुचलना
भ्रष्टाचारियों पर.. नकेल है कसनी
तब पवित्र... होगी ये जननी
इसके लिए.. तुम दो साथ..तुम चलो साथ
बस एक बार...बस एक बार
अन्ना और इस देश की ख़ातिर
तुम..चलो साथ..तुम...चलो साथ......
तुम..चलो साथ..तुम...चलो साथ......