जब तक मैं आपको डिग्गी की कहानी बताऊं,उससे पहले आपको इस शब्द का मतलब समझा देता हूं..डिग्गी,हमारे गांव में पानी इकठ्ठा करने की...हमारे गांव में ही क्या..पहाड़ी इलाकों में सीमेंट और पत्थरों से बनाई गई टंकी की तरह एक आयताकार संरचना होती है,जिसमें पानी इकठ्ठा कर सभी गांव वाले इसे उपयोग में लाते हैं...जब कभी नलों में पानी नहीं आता..और इसमें पानी बहुत दूर..जंगलों से..गधेरों से(नाले के समान)..जहां भी पानी मिलता है,पाइप की सहायता से..लोहे के नलों की सहायता से... बड़े ही जतन के साथ जोड़-तोड़ कर इस डिग्गी में इकठ्ठा किया जाता है,ताकि जिसे भी पानी की ज़रुरत महसूस हो वो बिना किसी हिचक के इसका पानी उपयोग में ला सकता था..ये तो हुई डिग्गी की बात...अब समस्या ये है कि आज के ज़माने में इसकी किसी को परवाह नहीं है.ये या तो टूट-फूट गई हैं,या किसी उपयोग में नहीं लाई जातीं..जोकि पानी के उपयोग के लिए पहाड़ों में सबसे अच्छा माध्यम माना जाता था..अब मैं जब घर जाता हूं तो इनकी दुर्दशा देखकर पुराने दिनों की याद आती है..जब इन्हीं डिग्गियों से हम लोग स्कूल के कपड़ों को धोकर इसपर ही सुखाने के लिए फैला दिया करते थे..प्यासे जानवरों के लिए बाल्टी भरकर पानी ले जाया करते थे..छोटे छोटे बच्चे(मैं भी जब घर में रहता था)नहाते समय एक दूसरे पर पानी उछाल उछालकर मस्ती किया करते थे..इन्ही डिग्गियों के आसपास लुका-छिपी का खेल खेला करते थे..आज सोचता हूं क्या ये वही डिग्गियां हैं..जो घासफूस,घनी झाड़ियों से ढकी और टूटी फूटी आसमां की ओर निहारती रहती हैं..बड़ी मुश्किल से उसका मुहाना दिख पाता है..बस मेरी लोगों से एक छोटी सी दरख्वास्त है कि पुरानी चीजों को हमेशा सहेज कर रखें..उनको नष्ट ना होने दें......काश ये डिग्गियां पहले की तरह हो जाएं..इनको ठीक करने का जितना भी प्रयास संभव हो सके करें, ताकि ये डिग्गियां भी कहीं यादों में ही बसकर ना रह जाएं..कुछ ऐसा हो कि जब मैं उस डिग्गी के पास से गुजरूं तो छोटे-छोटे बच्चों को एक बार फिर पानी से मस्ती करते हुए देख सकूं.........
Saturday, 21 May 2011
Monday, 16 May 2011
कुछ तो छूटा है....
कुछ तो छूटा है...
मेरा प्यारा गांव...
पहाड़ी अंचल में बसा मेरा प्यार सा घर...
वो मां का प्यार...वो पापा की डांट...
भाई-बहन से वो बड़े गुस्से से लड़ना..
कुछ तो छूटा है....
सुबह मां के हाथ की बनी वो गरमागरम चाय
जिसमें सिला होता था इनका ढेर सारा प्यार
थोडा ना-नुकुर करके ..इनको तंग करते हुअ उठना
पहली चाय की चुस्की...उनके हाथों से पीना....
कुछ तो छूटा है.....
उठकर दोस्तों से मिलना,उनसे बातें करना
प्रेम,तक़रार,उलझन,सुख-दुख की बातें करना
और करना बातें सच होने वाले सपनों की...
अपने आने वाले सुनहरे भविष्य की...
कुछ तो छूटा है....
थोड़ी छेड़खानी....थोड़ी शैतानी....
गांव में घूम-घूम कर शोर मचाना..
सबको साथ इक्टठा कर खेलने जाना...
दादा-दादी को तंग करना...
दादी की वो पुरानी बातों को सुनना..
और फिर मां के आंचल में धीरे से सिर रखकर सोना.....
कुछ तो छूटा है.......
अब बहुत याद आता है...
अब कभी-कभार जाना होता है....
घर से वापस लौटते समय....
मां की आंखों से टप-टप गिरते आंसू
वो पापा की सीख देना......
सच लगता है
बहुत कुछ छूटा है...
बहुत कुछ छूटा है.....
मेरा प्यारा गांव...
पहाड़ी अंचल में बसा मेरा प्यार सा घर...
वो मां का प्यार...वो पापा की डांट...
भाई-बहन से वो बड़े गुस्से से लड़ना..
कुछ तो छूटा है....
सुबह मां के हाथ की बनी वो गरमागरम चाय
जिसमें सिला होता था इनका ढेर सारा प्यार
थोडा ना-नुकुर करके ..इनको तंग करते हुअ उठना
पहली चाय की चुस्की...उनके हाथों से पीना....
कुछ तो छूटा है.....
उठकर दोस्तों से मिलना,उनसे बातें करना
प्रेम,तक़रार,उलझन,सुख-दुख की बातें करना
और करना बातें सच होने वाले सपनों की...
अपने आने वाले सुनहरे भविष्य की...
कुछ तो छूटा है....
थोड़ी छेड़खानी....थोड़ी शैतानी....
गांव में घूम-घूम कर शोर मचाना..
सबको साथ इक्टठा कर खेलने जाना...
दादा-दादी को तंग करना...
दादी की वो पुरानी बातों को सुनना..
और फिर मां के आंचल में धीरे से सिर रखकर सोना.....
कुछ तो छूटा है.......
अब बहुत याद आता है...
अब कभी-कभार जाना होता है....
घर से वापस लौटते समय....
मां की आंखों से टप-टप गिरते आंसू
वो पापा की सीख देना......
सच लगता है
बहुत कुछ छूटा है...
बहुत कुछ छूटा है.....
Monday, 9 May 2011
मेरा गांव...
अरसा गुजर गया मैंने वो खुशहाली नहीं देखी
गांव में अब लोगों की वो चहलकदमी नहीं देखी
वो भी क्या वक्त था...
जब किसी के चेहरे पर मैने बेरुखी नहीं देखी
अरसा गुजर गया मैने वो खुशहाली नहीं देखी
बूढ़ी दादी की शक्ल आज भी ढूंढ़ता हूं मैं
शायद किसी ने उनकी वो हंसी नहीं देखी
गांव में कोयल की कू से मन झूम जाता था मेरा
शायद किसी ने वैसी हरियाली नहीं देखी
दादा की मेहनत देखकर दंग रह जाता था मैं
हमने सूरज की वो तपती गर्मी नहीं देखी
अरसा गुजर गया मैंने वो खुशहाली नहीं देखी
गांव में अब वो लोगों की चहलकदमी नहीं देखी
गांव में अब लोगों की वो चहलकदमी नहीं देखी
वो भी क्या वक्त था...
जब किसी के चेहरे पर मैने बेरुखी नहीं देखी
अरसा गुजर गया मैने वो खुशहाली नहीं देखी
बूढ़ी दादी की शक्ल आज भी ढूंढ़ता हूं मैं
शायद किसी ने उनकी वो हंसी नहीं देखी
गांव में कोयल की कू से मन झूम जाता था मेरा
शायद किसी ने वैसी हरियाली नहीं देखी
दादा की मेहनत देखकर दंग रह जाता था मैं
हमने सूरज की वो तपती गर्मी नहीं देखी
अरसा गुजर गया मैंने वो खुशहाली नहीं देखी
गांव में अब वो लोगों की चहलकदमी नहीं देखी
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