Monday, 16 May 2011

कुछ तो छूटा है....

कुछ तो छूटा है...
मेरा प्यारा गांव...
पहाड़ी अंचल में बसा मेरा प्यार सा घर...
वो मां का प्यार...वो पापा की डांट...
भाई-बहन से वो बड़े गुस्से से लड़ना..
कुछ तो छूटा है....

सुबह मां के हाथ की बनी वो गरमागरम चाय
जिसमें सिला होता था इनका ढेर सारा प्यार
थोडा ना-नुकुर करके ..इनको तंग करते हुअ उठना
पहली चाय की चुस्की...उनके हाथों से पीना....
कुछ तो छूटा है.....
उठकर दोस्तों से मिलना,उनसे बातें करना
प्रेम,तक़रार,उलझन,सुख-दुख की बातें करना
और करना बातें सच होने वाले सपनों की...
अपने आने वाले सुनहरे भविष्य की...
कुछ तो छूटा है....
थोड़ी छेड़खानी....थोड़ी शैतानी....
गांव में घूम-घूम कर शोर मचाना..
सबको साथ इक्टठा कर खेलने जाना...
दादा-दादी को तंग करना...
दादी की वो पुरानी बातों को सुनना..
और फिर मां के आंचल में धीरे से सिर रखकर सोना.....
कुछ तो छूटा है.......
अब बहुत याद आता है...
अब कभी-कभार जाना होता है....
घर से वापस लौटते समय....
मां की आंखों से टप-टप गिरते आंसू
वो पापा की सीख देना......
सच लगता है
बहुत कुछ छूटा है...
बहुत कुछ छूटा है.....

2 comments:

  1. bahut achchi aur shaandar kavita hai santosh bhai line aur jajbaat ek doosre ko jodte hue gajab ka chitran kar rahe hai....

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